जीवों में जनन
कुत्ता - 30 वर्ष
तोता - 140 वर्ष
उदाहरण - युलोथरिकस, क्लेडोफोरा ।
अचलबीजाणु - ये कशाभिका विहीन बीजाणु होते हैं। इनसे भी नए पादपों की उत्पत्ति होती है।
उदहारण - स्पाईरोगाईरा, यूलोथरिका
हीपनोस्पोर - प्रजनन के दौरान प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न होने से अचलबीजाणु द्वारा मोटी भित्ति बन जाती है। यह बीजाणु शुक्तावस्था में पड़ा रहता है तथा अनुकूल परिस्थिति आने पर भित्ति फट जाए है। और नया पादप उत्पन्न होता है।
उदहारण - प्रोटोसायफन ।
कोनिडिया द्वारा - ये गतिहीन अचलबीजाणु हैं। जो बाहर की ओर बनते है। इन्हें बाह्य बीजाणु भी कहते हैं।
उदहारण - पेनिसिलियम, एस्परजिलस ।
लैंगिक जनन
(Reproduction In Organisms)
प्रत्येक जीवधारियों का एक निश्चित जीवनकाल होता है । जन्म तथा प्राकृतिक मृत्यु के मध्य का अंतराल जीव का जीवन काल कहलाता है।
जैसे - कछुआ - 100 से 150 वर्षकुत्ता - 30 वर्ष
तोता - 140 वर्ष
प्रजनन (REPRODUCTION)- यह एक जैविक क्रिया है। जिसके द्वारा जीव अपने समान संतातियों को उत्पन्न करते है । प्रजनन सजीवों का महत्वपूर्ण लक्षण है।
जीवों में प्रजनन तीन विधियों से होता है-
1- कायिक जनन- किसी पौधे के कायिक अंगो द्वारा नए पादपो का उत्पन्न होना कायिक जनन कहलाता है। इसे कायिक प्रवर्धन भी कहते है।
A. प्राकृतिक कियिक प्रवर्धन - इस क्रिया में पादप का कोई अंग मातृ पौधे से अलग होकर नए पादप उत्पन्न कर देते है।
1- भूमिगत तने-
- कंद - आलू
- प्रकंन - अदरक हल्दी
- धनकंद - अरबी केशर
- सलकंद - प्याज
- ऊपरी भूस्थारी - दूब
- भूस्तरिका - पुदीना
1- कलम लगाना (Cutting)- इस क्रिया में वांछित पौधे की छोटी- छोटी टहनिया कती जाती है। ये टहनियां कलम कहलाती है। इसमें कलम को मिट्टी मै गाड़ दिया जाता है। और इससे नया पौधा उत्पन्न हो जाता है।
उदाहरण - गुलाब गन्ना अंगूर गुड़हल आदि।
3- रोपण (Grafting)- इस विधि द्वारा दो अलग अलग पौधों की भागो को जोड़ दिया जाता है। जिससे एक पौधे पर ही दो प्रजातियों के फल प्राप्त किए जाते है।
उदाहरण - आम नीबू सेंब मै यह प्रक्रिया अपनाई जाती है।
कायिक प्रवर्धन का महत्व-
- कायिक प्रवर्धन सस्ती एवम् आराम विधि है।
- इसमें वृद्धि तथा उत्पादन तीव्रता से होते हैं।
- एक ही पौधे के कायिक भाग से अनेक नए पौधे प्राप्त किया जाते है।
- इच्छानुसार पौधे प्राप्त किया जाते हैं।
- केला अन्नानास अंगूर तथा गुलाब में बीज नहीं होते इं पौधों को कायिक प्रवर्धन द्वारा ही उगाया जाता है।
- एक ही पौधे से अनेक आनुवंशिक रूप से समान पौधे प्राप्त किया जाते है। जिन्हे क्लोन कहते है।
- वांछित पौधों मै होने वाले लक्षणों को आसानी से उगाकर प्राप्त किया जाता है।
अवगुण-
- इन पौधों मै विविधता नहीं मिलती है।
- अच्छे लक्षण तो प्राप्त होते हैं। किन्तु हानिकारक लक्षण प्रथक नहीं हो पाते ।
अलेंगिक जनन
(Asexual Reproduction)
- अलैंगिक जनन मै एक जनक की आवश्यकता होती है।
- इसमें युगमक नहीं बनता।
- संतति में सभी लक्षण जनक का समान ही होते हैं।
- अलैंगिक जनन मै केवल सूत्री कोशिका विभाजन होते हैं।
- उदाहरण - अमीबा, पैरामीशियम, युग्लिना, यीस्ट, कलमाडओमोनास, हाइ8ड्रा इत्यादि।
1- खंडन - इसमें सुकाय अनेक भागो मै टूट जाता है। तथा प्रत्येक भाग से नया पौधा बन जाता है।
उदहारण - स्पायरोगायरा, युलोथरिक्स ।
2- द्वीखंडन - इस प्रकार के अलैंगिक जनन मै एक जीव कोशिका दो संतति जीवों मै बदल जाते हैं।
उदहारण - अमीबा, पैरामीशियम ।
मुकुल - कुछ जीवी के शरीर में छोटे उभार बन जाते हैं जिन्हे मुकुल कहते हैं। ये मुकुल धीरे धीर विकसित होकर नया संतति जीव के रूप मै विकसित होकर जनक जीव के शरीर से अलग हो जाते हैं।
उदहारण - यीस्ट और हाइड्रा ।
एकाइनिड द्वारा - शैवालों मै प्रतिकूल परिस्थितियों के दौरान कोशिकाएं भोजन संचित के अपने चारो ओर एक आवरण बना देती हैं। अनुकूल परिस्थिति आने पर ये भित्ति टूट जाती है। तथा नया शैवाल विकसित हो जाता है। इसे एकाइनिड कहते हैं।
उदाहरण - नीले हरे शैवाल ।
चलबीजाणु द्वारा - शैवालों मै अनुकूल परिस्थितियों मै चलबीजाणु बनते है ये एक कोशिकीय होते है। तथा पानी मै तैरते रहते है।
तैरते हुए ये किसी सतह पर चिपक जाते है। और नए पौधे मै विकसित हो जाते है। चलबीजाणु द्वीकशाभिकी तथा चतुरकाशाभिकी होते हैं।उदाहरण - युलोथरिकस, क्लेडोफोरा ।
अचलबीजाणु - ये कशाभिका विहीन बीजाणु होते हैं। इनसे भी नए पादपों की उत्पत्ति होती है।
उदहारण - स्पाईरोगाईरा, यूलोथरिका
हीपनोस्पोर - प्रजनन के दौरान प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न होने से अचलबीजाणु द्वारा मोटी भित्ति बन जाती है। यह बीजाणु शुक्तावस्था में पड़ा रहता है तथा अनुकूल परिस्थिति आने पर भित्ति फट जाए है। और नया पादप उत्पन्न होता है।
उदहारण - प्रोटोसायफन ।
कोनिडिया द्वारा - ये गतिहीन अचलबीजाणु हैं। जो बाहर की ओर बनते है। इन्हें बाह्य बीजाणु भी कहते हैं।
उदहारण - पेनिसिलियम, एस्परजिलस ।
लैंगिक जनन
लैंगिक जनन
(Sexual Reprpduction)
नर युग्मक तथा मदा युग्मक के सनल्यन की प्रक्रिया लैंगिक जनन कहलाती है। इसमें -
- नर यूगमक को + स्ट्रेन कहते है तथा मदा युग्मक को - स्ट्रेन कहते हैं
- लैंगिक जनन मै अर्धसुत्री विभाजन होता है।
- आर्धसुत्री विभाजन के फलस्वरूप है ना तथा मादा युगमक़ बनते है। इस प्रक्रिया को युग्मक जनन कहते हैं।
- नर तथा मादा युग्मक़ के सनल्यान से युग्मनज zygot बनता है zygot द्वी गुड़ित होता है।
निषेचन - नर युग्मक ताथ मादा युग्मक के संलयन से युग्मनज द्वी गुडित बनने की प्रक्रिया निषेचन कहलाती है।
निषेचन दो प्रकार के होते हैं -
1 बाह्य निषेचन - कुछ जीवों जैसे मेंढ़क मछलियों में सुक्रानू अंडाणु शरीर से बाहर जल मै मुक्त के दिए जाते हैं। ये जल मै तैरते हुए आपस में संलयन होकर युग्मनज बना लेते है यह क्रिया बाह्य निषेचन कहलाती है।
2 अंतः निषेचन - अधिकांस बड़े विकसित जीवों में सुक्रानु मादा शरीर के भीतर अंडाणुओं से सनलयित होकर युग्मनज तथा भ्रूण बनते हैं। इसे अंतः निषेचन कहते हैं
उदहारण - कवक, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी, ब्रायोफाइटा, टरोडाफियाइटा जिमनोस्परम तथा एंजियोस्परम ।









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